#विजय
विजय की कोई परिभाषा नहीं यहाँ
सभी बनाते अपनी-अपनी परिभाषा
कभी अहं को विजय मानकर चलते हैं
कभी हवा में सपन सुहाने बुनते हैं
कभी किसी कठिनाई के आ जाने पर
किसी के भी काँधे बंदूक सजाते हैं
उस पर जब मुश्किल पड़ जाती है
अपनी विजय को घोषित भी कर देते हैं
प्रश्न यहाँ पर सम्मुख आन खड़े होते
विजय के कुछ नियम यहाँ कड़े होते
विजय करनी है अपने ही भावों पर
विजय करनी स्वार्थों पर और चाहों पर
विजय मन की कुंठाओं पर करनी है
मन की विजय ही जीवन की वैतरणी है।
डॉ.प्रणवभारती