मैं भाषा हूँ,
भारत की,
शुद्ध हूँ, सत्य हूँ, अहिंसक हूँ,
मिट्टी की सौंधी सुगन्ध हूँ,
गंगा की तरह निकलती हूँ,
पहाड़ की तरह खड़ी हूँ,
बोल-चाल पग-पग की,
पूर्वजों की याद हूँ,
युग-युग का विश्वास हूँ,
मैं भाषा हूँ,भारत की,
विराट हूँ,
कोटि-कोटि कंठों का
मिलाप हूँ ।
*** महेश रौतेला
१४.०९.२०१४