उन्हें गुरूर था कि उनसा नहीं कोई यहाँ,
उन्हें गरूर है, कि उनसा नहीं कोई यहाँ,
ज़रा सी रोशनी क्या आई, चाँद जाने कहाँ गुम हो गया,
वो कहते थे मोहब्बत है करते रहेंगे,
वो कहते थे तेरे लिए यूँ ही जीते रहेंगे,
जब निभाने की बात आई, अपना साया भी दगा दे गया,
वो क्या जानें इश्क़ में उनके, कितने सितम उठाये हैं,
खुद में मगरूर वो क्या जानें, खुदी को हम लुटाए हैं,
मोती बनने के बाद पानी, सीप से नाता ही बिसर गया।
~ प्रणव