पूजा ने फ्रिज में रखी भिण्डी देखी और फ्रिज फिर से बंद कर दिया। भिण्डी उसकी प्रिय सब्ज़ी थी लेकिन आजकल उसे भिण्डी बनाने में कोफ़्त होती थी।
उसकी बेटी ने कहा भी,“मम्मी बहुत दिन से भिण्डी नहीं बनाई। बना दो ना”। उसने हाँ, अच्छा कर के उस बात को टाल दिया।
अब ये भी क्या बात थी। भिण्डी सबको पसंद है तो बनाने में क्या हर्ज हो सकता है?
पूजा ने जैसे तैसे खुद को समझाया और बिल्कुल वैसे भिण्डी बनाई जैसी उसकी माँ बनाती थी। सबने खाना खाया और खाने की तारीफ़ की। पूजा ने खाना शुरूकिया कि उस से पहले ही उसकी बेटी एक छोटा सा रोटी का निवाला भिण्डी के साथ बना कर ले आयी। पूजा ने जैसे ही मुँह खोला और निवाला अंदर किया उसके आँसू ज़र ज़र कर बहने लगे।
बेटी सहम गयी। पूजा के पति एकदम से खड़े हो गए और पूछने लगे कि सब ठीक तो है? पूजा ने कहा, “हाँ! बस माँ की याद आ गयी”।
इस बात पर पति हंसने लगे और बोले,“चल पगली! बस इतनी सी बात”। पूजा न आंसुओं से भरी आँखों से ही एक छोटी सी मुस्कुराहट दी। और पति को आश्वासन मिल गया कि सब ठीक है।
सब ने खाना खाया और सब अपने अपने कामों में व्यस्त हो गये। पूजा वहीं खाने की मेज़ पर बैठी भिण्डी को देखती रही और सोचने लगी कि उसकी माँ को कैसे पता चला था कि उसे भिण्डी बहुत पसंद है, उसने तो कभी माँ से नहीं कहा था। जब बचपन में सब खाना खा रहे होते थे तो जिस भी दिन भिण्डी बनती थी कैसे उसकी प्लेट में बाक़ी सब लोगों की प्लेट से ज़्यादा भिण्डी होती थी। जब भी पिताजी सब्ज़ियाँ ख़रीदने जाते तो भिण्डी ज़रूर लाते और माँ उन्हें ताना मारती कि अभी कल ही तो खाई है, आज फिर उठा लाये? पिताजी पूजा की और देखते और पूजा अपने भाई को चिढ़ाने वाले अन्दाज़ में उसे देखती और भाई हमेशा कहता, “आप केवल उसी की पसंद का ध्यान रखा करो”।
एक ही महोल्ले में रहने वाली चाची तक भिण्डी बनने पर फ़ोन कर के खाने का न्योता दे जाती। भिण्डी ना हो गयी जायदाद हो गयी। उसकी दादी कहा करती थी कि पूजा तेरे दहेज में हम भिण्डी देंगे और पूरा घर हंसने लगता था।
कहाँ गया समय? यही तो था। कल की ही तो बात है जब मैं माँ कि साथ बैठी थी उनकी रसोई में। अब क्या रसोई भी केवल उन ही की हो गयी? मैं भी कुछ भी सोचती हूँ। अब ऐसे खुद से ही सवाल जवाब कौन करता है? भाई भी तो यही कहता था कि क्या खुद से बुड़-बुड़ करती रहती है और फिर उसकी नक़ल करके सबको दिखता था। उस वक्त तो बहुत ग़ुस्सा आता था, आज हँसी आ रही है।
“तुम्हारे लिए इतनी सी बात होगी, मेरे लिए तो भिण्डी मेरा बचपन है”, पूजा ने आंसुओं भरो आँखों से बुदबुदाया और खिड़की से चाँद की ओर देखते हुए देखा और चुपचाप भिण्डी की सब्ज़ी खाने लगी।