गुप्त रख अपने ग़म को तुम , मुस्कुराओ जहां के साथ
वर्ना तनहा कर देगा ज़माना , छुड़ाकर तुमसे अपना हाथ
जहां में चढ़ते सूरज को , सलाम करती है ये दुनिया
नहीं कोई भाव मिलता है , शाम के ढलते सूरज को
दर्द का मत मनाओ दुख , आखिर अपना ही तो है
वर्ना अब है कौन अपना , अज़नबी इस ज़माने में
सगे बनते पराए सब , अब किसे अपना हम माने
वक़्त पर काम ना आता , किसी को कितना भी जाने
बने दुनिया में सब अपने , प्यार अपना सा करते हैं
ज़रा पहचान क्या होती , सभी मुंह फेर लेते हैं
" सरस " दुनिया हो सब अपनी , जादू कर तू कुछ ऐसा
करें सब प्यार आपस में , सर चढ़कर बोले ना पैसा
हो कीमत मानव मूल्यों की , रिश्तों की गर्माहट हो
बनी मुर्दों की बस्ती में , आदमी की बसाहट हो
ख़ुदा की श्रेष्ठ कृति हैं हम , करें साबित ज़माने में
कि लग जाएं कई सदियां , जहां को हमें भुलाने में
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#गुप्त