एक आदमी है घरमे, जो बोझ उठाया करता है,
अपनी गीली पलको को वो छुपाया करता है।
हमे नही पता कैसे पूरे हुवे हमारे बचपन के शोख,
फ़टे कपड़े पहनकर, वो हमें खिलोने दिलाया करते है
रूठ जाता था में कभी कभी जिद्द ले कर,
वो थका हुवा था, मगर मुजे मनाया करते है
मनोज संतोकि मानस