भले ही साथ मत
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संबंधों से संबोधन तक गिरह न जाने कितनी भीतर
और दंश चुभते हैं मन में ,मन हो जाता है ज्यों बेघर
सन्नाटे आवाज़ लगाते , जीने-मरने की कोशिश में
और कमलिनी रूठ गई है ,अंधियारे के उस झुरमुट में
मन की गति हुई लंगड़ी है,चार कदम भी चल न पाती
टूटे दंशों की स्मृति से हर पल जाने क्यों टकराती
जितनी बार पृष्ठ पलटे हैं पीड़ा बढ़ती ही जाती है
कहाँ कोई सुन पाता मन को प्रस्तर प्रतिमा बन जाती है
श्वासों की गति थिरक रही है ,जाने किसकी करे प्रतीक्षा
और स्वयं मन के द्वारे पर खड़ा हुआ 'मैं' लेकर भिक्षा
भले ही साथ मत देना तुम यूँ पर बेचारा मत कर जाना
माटी का तन टूटा -बिखरा किरचों को किसने पहचाना
शाश्वत सौगंधों की बातें हो जाएँगी तीतर-बितर यूँ
आने वाले कल की झोली ,कोई यहाँ न भर पाएगा
मखमल के पैबंद लगे हों बेशक रेशम की पोशाकें
मन के भीतर का कोना बस,अँधकार में रह जाएगा |
डॉ.प्रणव भारती