फिर झाक कर देखने का मन किया उन पुराने बक्सों मे,
जहाँ आज भी मेरा बचपन मौजूद है।
इस कदर संभाल कर रक्खी है कुछ यादे
जो बोहोत ही अज़ीज़ है।
रेड -ब्लैक रिबन, युनिफोर्म , ईडीकार्ड
वो स्लेट, वो ड्रॉइंग बुक,और वो दो क्लिप वाला बस्ता
कुछ गोल गोल पत्थर, कुछ छिप, कुछ लकड़िया,
डिब्बा भर कर खेलकर जीती हूवी गोटिया,
चुन्गम मे निकलने वाले वो स्टिकर्स,
क्रिकेटर्स के प्लेकार्ड्स, प्यारे से वो ग्रीटिंग कार्ड,
छैया छैया गीत जिसमे बजता था वो खिलोने वाला फोन,
कुछ टूटे हुवे माटी के बर्तन जो खुद बनाये थे,
वो कलरफुल फ्रेंडशिप बैंड जो सबको दिखाये थे,
चावल पे अपना नाम लिखा हुवा किचेन,
हाथो मे पहनने वाला वो स्केल,
यूनिफार्म फटने पर इस्त्री करके लगाने वाली वो तितलियाँ,
बुक्स पर चिपकाने वाले स्टिकर्स,
और भी बहोत कुछ जो संभाल कर रक्खा है।
ये उन दिनोंका खजाना है जब हर दिल आवारा था,
खेलने की मस्ती थी, अलग ही हमारी हस्ती थी।
ना कोई टेंशन ना कोई फ़िक्र, ना फ़ोन ना इंटरनेट,
बस स्कूल, साईकिल, कुछ पक्के यार। शाम को
होमवर्क और उसके बाद ग्राउंड पर मचने वाला सोर।
वो भी क्या दिन थे, वो भी क्या बचपन था।
c. gamit