Hindi Quote in Poem by Chirag Vora

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तुम्हारा शहर------
अक्सर सोचता हूँ कैसा होगा वो शहर
जहां तुम बसते हो
कैसी होगी वो सुबह
जो तुम्हें छूते हुए उठती है
तुम्हारी अलसायी सी
सांसों की कम्पित ध्वनियां
मुझ तक पहुंचती है...
गर्म सांसों में ताजा चाय की खुशबू
नई पत्तियों की हरी-हरी गंध
तुम्हारे होठों से लगकर सूर्ख हो गई है
और कोसों दूर मेरा चेहरा लाल हो गया है
जैसे लाल पलाश के फूल...
देखता हूँ बिन बुलाए बसंत आ गया है
बसंत की धुली-धुली सी हवा
चारो दिशाओं में फैल गयी है
धूप से भरा बादल का टुकड़ा
तुम्हारे चिलमनों से झांक रहा है
क्या कर रहे होगे तुम अभी
शायद कविता की कोई किताब
तुम्हारे हाथों में होगी...
देखो प्रिय
कविताएं झर रही है
सफेद झक-झक फूलों की तरह
शब्द बह रहे हैं
आओ साथ-साथ भीगे
मैं नदी बन बहता रहूं तुम्हारे भीतर...😊
(अज्ञात)

Hindi Poem by Chirag Vora : 111556143
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