Hindi Quote in Motivational by Asha Saraswat

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यादों के झरोखों से-(२)
भावना-
अर्द्ध रात्रि में जब किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी तो पिता जी ने दरवाज़ा खोला तो देखा एक व्यक्ति हाथ जोड़ कर अभिवादन कर रहा था ।पिता जी ने अभिवादन स्वीकार करते हुए पूछा कहिए कैसे आना हुआ और मन ही मन सोचा मैंने कभी इन्हें देखा तो नहीं है।
सामने खड़े व्यक्ति ने बड़ी विनम्रतापूर्वक कहा -हम पाँच लोग है जो कि आपके पड़ोसी शर्मा जी के घर आये हैं हमें उनके साथ एक समारोह में शामिल होने दूसरे शहर में जाना था ।सब कुछ पत्र भेजकर तय हो गया था परन्तु हमारी सवारी देर से आई और हम समय से नहीं आ सके ।रात्रि बहुत हो गई है,हम किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं जानते ।
आपसे निवेदन है कि आज रात्रि हम लोग विश्राम कर लें ,सुबह हम चले जायेंगे ।पिता जी कुछ उत्तर देते तभी अंदर से अम्मा ने कहा ठीक है आप लोग अंदर आजाइऐ मैं भोजन का प्रबंध करतीं हूँ ।
अम्मा ने सबके लिए बिस्तर लगाया और चूल्हा जलाकर भोजन बनाने की तैयारी में लग गईं ।सबको भोजन खिलाने के बाद अम्मा रसोईघर की सफ़ाई में लग गई,कब सुबह हो गई पता ही नहीं चला ।
पिता जी ने आकर बताया कि सब लोग जाने की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए कुछ अल्पाहार बना दो तो वह सब नाश्ता कर लेंगे ।
अम्मा स्नान करके फिर से चूल्हा जलाकर तैयारी में जुट गई।आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी अम्मा पहले नवग्रह को प्रसन्न करने के लिए एक छोटी रोटी अग्नि को समर्पित करतीं थीं फिर गाय की रोटी बनाती,पूरा भोजन जब बन जाता तो अंतिम रोटी कुत्ते के लिए अवश्य बनातीं थीं ।
हम बच्चों को नहाने के बाद पूजाघर में अवश्य जाना होता था ,नहीं जाने पर देर से खाना मिलता था इसलिए सब जल्दी से अपने दैनिक सुबह के कार्यक्रम पूरे कर लेते थे।
हम भाई-बहन जब आँगन में कुछ भी खाते तो चिड़ियाँ चीं-चीं करतीं आ जाती ,अम्मा उन्हें भी चुग्गा डालने को हम से कहतीं और स्वयं भी डालती थी और हम सब से बोलने को कहतीं———
राम की चिरैया,राम जी के खेत ।
खाओ री चिरैया,भर-भर पेट ।।
हमें समझातीं कि जीव जन्तु का पेट भरना हम सब का कर्तव्य है ।बरसात के दिनों में जब चींटियाँ निकल आतीं तो अम्मा हम सब से आटा डालने को भेजतीं थी ।
सभी भाई-बहन अपने-अपने कर्तव्य का पालन करते हुए खूब खेला करते ।
हम लोगों को अम्मा ख़ाली नहीं बैठने देती जब छुट्टियों के दिन होते तो पड़ौस की भाभीजी के पास नई-नई चीजें सीखने को भेजा करती थी।अम्मा स्वयं कुछ ज़्यादा नहीं जानती थीं लेकिन उनका मानना था कि बेटियों को सभी कार्य कुशलता से आने चाहिए ।क्रोशिया,कढ़ाई,पेंटिंग,खाना बनाना,मेहमानदारी सारे कार्यों में निपुण होनी चाहिए ।कभी भी भोजन के समय कोई आ जाये तो भोजन कराकर भेजना अम्मा की आदत थी ।मेरी सहेलियाँ मेरे घर में जब आतीं तो खाने का आनंद लेती थी।
उनकी भावना थी ——-अतिथि देवों भव —जा की रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ।👏👏👏👏👏

Hindi Motivational by Asha Saraswat : 111555492
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