#भार
मैंने देखा है
आसमानी अम्बर से,
कुछ मौन आखों
को चीत्कार करतें।
आती क़दमों से
विश्वास भरते,
और वापिस जाती
पगों से सपने टूटते।
सेर, पाव और पसेरी में ही
इनका
समय नापा जा सकता ।
क्योंकि घड़ी इनकी ,
अलग चलती है
#भार देख ही बढ़ती है।
सुख के गलियारों
में समय इतना ही
मिलता है कि
आज सूरज
डूबने से पहले
बटखरा बांध लिया ।
उल्लास है
मनाते जब भार
किंचित कम हुआ ।
ये कुछ लोग थे
जिन्होंने, विधाता
से मांग लिया था
जीवन भर का संघर्ष
और उसने दे भी दिया
छोटे से तथास्तु से
जीवन भर का रण ।