साये की तरह आती है ख्वाब में
जी भर दिल बहलाती है ख्वाब में ।
मैने जो भी लिख थे गीत ग़ज़ल
उसको खूब गुनगुनाती है ख्वाब में ।
पढ़ लेती है मेरे चेहरे का भाव
मगर हँसती मुस्कराती है ख्वाब में ।
दिन के उजाले दूर हो जाती मुझसे
चाँदनी रात में मंडराती है ख्वाब में ।
तारीफ सुन अपने खूबसूरत हुस्न की
शिहर जाती है इठलाती है ख्वाब में ।
साथ होगा क्या तुम्हारा हमारा कभी
न हा न ना बोला शर्माती है खवाब में।
गजब की सजी है सँवरी है सावन में
मगर शान्त है बलखाती है खवाब में ।