मेरा मानना है कि जब दुःख अपनी सीमा पार कर लेता है तो उदासी चेहरे पर नहीं आती, बल्कि वह हृदय में समाहित हो जाती है, और साथ ही वह उदासी आँखों पर हावी होने लगती हैं.. मगर मुस्कुराहट तब तक आदि हो जाती है झूठ की।
मुझे लगता है इंसान जब दुःख को बर्दाश्त नहीं कर पाता तो उसे अंदरूनी रूप से जीने लगता है सतही स्तर पर स्वयं को प्रसन्न दिखा कर।
हाँ मगर ऐसे में यह कह पाना अवश्य मुश्किल होगा की दुःख इंसान में है या इंसान दुःख में।
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