एक बार मुझे छू लेते तुम जो,,
तो मैं गंगाजल हो जाती......
जो तुम होते वृहद हिमालय
तो मैं पावन सरिता बन जाती,,
तेरे हृदय से लिपट - लिपट
पल - पल बहती
पल - पल बलखाती.......
जो तुम होते वृक्ष और तरूवर
तो मैं बसंत मलय बन जाती,,
तेरी सांसों में घुल कर के
तेरी काया को महकाती ......
जो तुम होते मंदिर का द्वारा
तो मैं उसकी देहरी बन जाती ,,
तेरी चरणों की रज पाकर
नित नित अपने शीश लगाती.....
जो तुम होते तुलसी का चौरा
मैं निश - दिन फेर लगाती ,,
तुम दीपक बन जलते रहते
मैं बन धूप आंगन महकाती ......
एक बार मुझे छू लेते तुम जो,,
तो मैं गंगाजल हो जाती......