जानती हूं जिंदगी पल दो पल की है
आज हुँ शायद कल नहीं
इसी लिए सब समेटना चाहती हुँ
अपनो को खुश देखना चाहती हुँ
कितना भी कर लूँ पर में
कुछ न कुछ छूट ही जाता है
चाहा था अपने ज़ज़्बातको काबू में रखे
और जग में खुशियां बांटे
पर ये जज्बात हर बार बीच में आ जाते है
अल्फाज़ो का भी यही काम है
जहां नही निकलना वही निकलते है
हर रिश्ते बिखर देते है
हमे फिरसे अकेला कर देते है
अकेले आये है और अकेले जाना है
साथ कहाँ हर दम कोई देता है
ए जिंदगी क्या चाहती है तू मुझसे
खुलके कोइ बात कर मुझसे
क्यों में जो चाहती हुँ वो कर नही सकती
फिर न कहना यूँ किसी से
तुजे मुक्कमल जहाँ मिला है
हाथ में मेरे कुछ नही है
तूने जो ये रिश्तों की डोर से बांधा है