चौबीस घण्टे में ही
मोबाइल से दूर होने का अर्थ अभिरामी आया
दरवाजे पर लगे
फूलों की महक ने
बहुत दिन बाद आज फिर आकृष्ट किया
भरी उमस और
तीखी धूप में अपने
नन्हे के लिये चारा लाने जाती हुयी गौरैया दिखी,
तो भरी दोपहरी ही में
सब्जी वाले का ठेला गतिमान दिखा
वहीं आज बहुत दिन बाद मेरी राह तक रही आलमारी की अनटच्ड किताबें मुस्करायीं..
कई दिनों से
मन में घुमड़ रही
मनोहर चौबे की कहानी पूरी हुयी..तो
कई दिन बाद बाबूजी के पास बैठ उनके रोचक संस्मरण सुने,
श्रीमती जी द्वारा अम्मा के पैर दबाने के दौरान चेहरे पर आयी संतुष्टि को घण्टों निहारा..
जीवन के वे तमाम पल जो आज भी मुझमें रचनात्मकता भरते हैं..
दूर हो रहे हैं
तो आओ कुछ देर के लिये मोबाइल को रख दें कहीं दूर..
और कान लगाकर सुनें
कि भरी दोपहरी में भी क्या कह रहे हैं
खिड़की के बाहर खिले वे जीवन रंग के फूल..
राजेश ओझा