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'दोस्त' कह रहा था;
"तुमसे न कोई रिश्ता है,
फिर भी तू लगता अपना है।
कुछ अपनी कहने को,
कुछ तेरी सुनने को,
ये मन बैचैन रहता है।।"
हमने भी अपना सिर खुजाया,
हृदय का भाव कह सुनाया ;
"एक अनजान रिश्ता है तुमसे,
जो अव्यक्त है तो है अनुपम भी।
यूँ शब्दों से न खेलो,नाजुक हैं बेचारे,
ऐसा ना हो कि
कहीं बात की चूड़ी ही मर जाए,
और अर्थ का अनर्थ हो जाए।।"
"रिश्तों की इतनी समझ मुझमें कहाँ गुरु!
अपना तो दिन भी होता है तुमसे शुरू।।"
✍️ परमानन्द 'प्रेम' NHR💞
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