कहानी गूंजे घर - घर में , कर गुज़र ऐसा कुछ तू भी
बदल दे ज़ायका सुनने का , शोरगुल के ज़माने में
कथा सुनते हैं ईश्वर की , मन होता है जब विचलित
खरे उतरें ना क्यों हम सब , इंसानियत के पैमाने में
ओढ़कर चोला रहबर का , लगे रहबरी ज़ताने में
पाप का घड़ा है जब भरता , भटकते हैं ज़माने में
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#कथा