कहना तो है तुमसे बहुत सारी दिल की बाते
पर क्या तुम सुन सकोगे दिल से ही..
कहकर, कहना अब मुमकिन नही तुमसे
मेरी खामोशिया सुन सकोगे क्या दिल से ही..
क्यों मैं सिर्फ मैं हूँ क्यों तुम सिर्फ तुम हो
क्यों हम अब हम नही है..
बात तो इतनी सी है पर बैचेन बहुत करती है..
मैने बिताए है कई लम्हे गम-ए-तन्हाई में..
और जिया है सूनापन बन्द दीवारों में..
रोक लिए कई आसूं जमी पर गिरने से पहले,
अपना लिया गम को यूँ दिल से ही..
नहीं समझ पाए तुम खामोश, बेबस निगाहों को,
भला दर्द दिलों का कौन जान पाता है दिल से ही..
पर तुम समझ लेते हर बात जो अनकही सी थी,
ज़िन्दगी जो ज़िने से पहले दम तोड़ रही थी
तुम जोड़ लेते हर वो आस जो टूट चुकी थी..
पर रिस्ते जो टूट गए हो फिर कहाँ जुड़ते है दिल से ही..