ऊपरवाले से तो डर।
ऊपरवाले की सब पर नजर।
सबकी सुनता है विश्वम्भर।
रखता है वह सबकी खबर।
फ़रिश्ते बन रक्षा करने सत्य की
आसमान से जमीन पर आते उतर।
बस तूँ सत्य से न कभी मुकर।
तूँ दीन दुःखियों की पीड़ा हर।
तेरी ही मरजी से बसता घर।
तेरी कृपा से सब जीव मुक्त विचर।
तूँ ही है सत्य, सार।
सौंप दिया मेरा सर्वस्व जीवन भार।
तूँ ही है एकमात्र मेरा आधार।
पापियों का कर संहार।
भव सागर का तूँ ही है तारनहार।
मेरी जीवन नौका कर रही डावाँ-डौल मझधार।
सुन मेरी आर्त पुकार, तूँ ही कर पार।
नाश कर मेरे सारे मनोविकार।
मेरे अवगुणों का कर परिष्कार।
मुझ में नव शक्ति, नव उत्साह का कर नवसंचार।
-दीपेश कामडी 'अनीस'