चलती प्रचंड बयार है , मचा हाहाकार है
विष नदी के सैलाब में , जीवन की पुकार है
झूठ के तूफान में , अस्तित्व की दरकार है
चीख रहा सच यहां , झूंठो का कारोबार है
बन के दीप हम लड़ें , घना ये अंधकार है
हद में रहे चला कुचक्र , ये मेरी ललकार है
असीम अपनी सभ्यता , दुश्मन की चीत्कार है
पांसे वो सभी चल लिए , हर कदम पे उनकी हार है
समय के उन थपेड़ों से , उड़ी गर्द एक प्रकार है
अपने जो काल सर्प थे , चला उनका कुप्रचार है
दर्पण से गर्द हट गई , सब दिख रहा आरपार है
हुई भूल को अब भूलकर , नया युग बने तैयार हैं
अपनी आन बान शान का , आदर और सत्कार है
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#प्रचंड