कर्म में नीति अच्छी और पवित्र होती है,
वह,
मनुष्य को भजन कीर्तन और मंदिरों में जाने की जरूरत नहीं पड़ती,
क्योंकि,
जो मनुष्य नीति एवम् निष्ठा से अपना कार्य करता है भगवान स्वयम् उनके ह्रदय में स्थापित होते है।
और,
जो मनुष्य को पालता है उसे कर्म करने पर सही समय उनको मुल्य देता है,
और,
जिस मूल्यांकन से उनके परिवार का पेंट भरता है,
उस मनुष्य को सदेव उस पालने वाले मनुष्य के हितों में कार्य करना चाहिए ना की दिखावा,नींदा और झूठ्ठी प्रंशसा।
॥राधै राधै॥