उसे अधिकार था पूरा तुम्हारे वियोग में तड़प कर मरने का। रो-रोकर माथा पीटने का.. चीखने का, चिल्लाने का.. जानते हुए भी की तुम सुनोगे नहीं, वापस आओगे नहीं, तुम्हें पुकारने का।
तुम्हें जाते हुए देख एक आख़िरी बार तुम्हारे पीछे दौड़ने का।
उसे अधिकार था तुम्हारी शीतल हो चुकी देह को अपनी गर्म हथेली से छूने का।
विदा हो रहे तुमसे लिपटकर खुद को तुम में समाहित कर देने का। तुम्हारे साथ ही सबसे विदा लेने का।
मगर, यह अधिकार उस से सभी ने छीन लिया।
यह अधिकार उसने ही स्वयं से छीन लिया।
बस इसलिए कि उसे यूँ बिलखता हुआ देख सबको दुःख होगा। अब उसे तुम्हारा प्रेम कभी नहीं मिलेगा।
उसके टूट के बिखरने पर कोई उसे समेट नहीं सकेगा.. कोई उसे तुम्हारी तरह प्रेम से संभाल नहीं सकेगा।
उसके आँसुओं को देख तुम दौड़े चले नहीं आओगे।
बस इसलिए उसने स्वयं को तो नहीं, मगर स्वयं के उन प्राणों को तुम्हारे साथ विदा ज़रूर किया है.. जो तुम्हारे प्रेम के भूखे हैं।
केवल इसलिए क्योंकि उसे मजबूत दिखना है, उसने दुःख को सीने में दफ़नाया है.. निष्कारण ही अधरों को फैलाकर मुस्कुराना शुरू किया है और शोर को भींच कर रखा है दाँतों के तले.. क्योंकि सभी यही चाहते थे।
बस इसलिए कि अब वियोग के कष्ट में कहे गए शब्दों का अर्थ नहीं है.. कोई उस दर्द को दूर कर नहीं सकता.. उसे मौन कराया गया.. और फिर उसने उस मौन को अपना लिया।
अब आजीवन वह मौन उसके प्राणों को, धीरे-धीरे बिना किसी शिकायत के, दीमक की तरह खाएगा.. और शोक उसमें नहीं होगा क्योंकि वह अब स्वयं ही शोक है। किसी स्तर पर जीवित रहते ही, हो चुकी स्वयं की मृत्यु का शोक।
मेरा मानना है की मनुष्य पीड़ा को कभी सहन नहीं कर पाता। मगर क्योंकि कष्ट या पीड़ा में वह शिव की भांति तांडव को आधार मानकर स्वयं की अवस्था को प्रकट नहीं कर सकेगा.. इसलिए मौन हो जाता है।
वह उस अधिकार के साथ दुःख को प्रकट ना कर पाने के विष को पीकर आजीवन मौन रहता है।
मेरे अनुसार मौन भी तांडव है.. घोर तांडव।
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