मेरे दबे ज़ख्मों पैगाम लाता है
वो सुबह नहीं शाम इल्ज़ाम लाता है
किसी की आखों में खोया सा
आधी रात में रोया सा
वो पल अजीब आज भी आता है ,इल्ज़ाम लाता है
अब नशा इतना कर लिया इन इल्ज़ामों का
बस यूं ही गुजरता दिन मयेखनो सा
बादल लिए कितने मकान हमने
ना जाने कौन बता देता है ज़ख्मों को मकान मेरे 🥰
अंजली पांडेय