खामोश नजरों में अफ़साने बहुत है
दुख दर्द पर हसने बाले भी बहुत है
मलहम का तो पता नही नमक लिये इंसान बहुत है
मुर्दा इन्सानों की बस्तियों मे जिंदा एह्सास बहुत है
कागज की कस्ती लिये किनारों पर खड़े है
किसे पता है शांत समुद्रों मे तूफान बहुत है
यूं तो बेहती नदियों के दिबाने बहुत है
झरनों मे भींगने का़ अरमान बहुत है
पत्थरों पर बेहता पानी सीतल तो बहुत है
उँचाईयों से पत्थरों पर गिरे तो उग्र बहुत है
- RJ krish