हम इंसान कल की फिकर में अपनी आज तबाह कर देते हैं और यह प्रकृति पशु पक्षी अपना आज जी भर के जी लेते हैं हर एक चीज के लिए हमें अपनी छोटी छोटी खुशियां को खो देते हैं और यह दूसरे सजीव अपना हर एक क्षण कितनी भी मुसीबत आए फिर भी कितनी मस्ती से जी लेते हैं हम कभी रूठ जाते हैं कुछ काम नहीं करते लेकिन कभी सुना है सुबह की पहली पहर हुई ना हो,की कभी पक्षी अपनी आवाज से हमें जगाते नहीं, और सभी फूल पेड़ पौधे अपने आप से ही मुस्कुराने से इतराते हैं कि गुनगुनाती सी तितलियां भी कभी रूठ जाती होगी, क्या नदी अपना प्रवाह बदल देती है क्या,कभी कुदरत भी अपना कार्य करते रूठ जाते हैं क्या ....जब हम तो अपने आप से या इंसानों से भी कई बार रूठ जाते हैं क्यों हम इनकी तरह प्रकृति के तत्वों की तरह नहीं बन पाते क्यों हम भी बिना किसी दबाव के कार्य नहीं करते क्यों हम इस प्रकृति का लुफ्त नहीं उठा पाते क्यों हम इंसान अन्य जिवो की तुलना में अपनों से और अपने आप से ही रूठ जाते हैं आखिर हम क्यों है ऐसे....Bindu 🌺