कमी क्या रह गई मुझमें , अहसास इसका ना कर पाई
ज़माना दे रहा ताना , मैंने किस्मत बुरी पाई
ना सूझे मुझे अब कुछ भी , ना कोई आस बाकी है
ज्यों मधुशाला में अब शायद , बचा नहीं कोई साकी है
निराशा के गहन अंधेरे में , लगा सूरज है उग आया
उम्मीदों की किरण फूटी , किस्मत ने पंख लहराया
क्या यूं बदलाव जीवन में , कहीं ऐसे भी होते हैं
क्या किस्मत यूं बदलती है , जादू ऐसे भी होते हैं
कमी क्या थी न समझी मैं , क्या कुछ ऐसा भी होता है
देखा जब से तुम्हे मैंने , लगा ज्यों कुछ - कुछ होता है
बदल गई मेरी अब दुनिया , बदल गई मेरी किस्मत भी
ये कैसा खेल विधि का है , चकित हूं और विस्मित भी
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#कमी