दयालुता मूल है धर्म का , जहां मानवता पलती है
यही है सार ग्रंथों का , जिससे ये दुनिया चलती है
दया का भाव हो दिल में , निर्बल के बल बनें हम सब
निडर हो जीव दुनिया के , अभय विचरें जहां में सब
कुटिल या शत्रु हों जग के , दया के पात्र नहीं होते
नराधम , नींच होते ये , सज़ा के पात्र ये होते
दया का गुण ही मानव को , महामानव बनाता है
जहां पर है नहीं यह भाव , वहां दानव बनाता है
यहां पर देव हैं जितने , दयासागर हैं कहलाते
मानव बनता है इश्वर , यदि दया का भाव अपनाते
#दयालुता