आज
तुम
एक अरसे के बाद मिले...
शायद
कुछ झिझक के साथ,
न अपने से थे तुम,
न पराये से...
न पहले की तरह तुम
गले लगकर मिले;
न आँखों में आँखे डाल
कुछ खामोश जज़्बात को जाहिर किये...
तुम्हारी नजरें भी
कुछ झिझकते हुई
आँखों के कोने से छूप कर
देख रही थी मुझे!
न तुमने पहले की तरह
मेरे हाथों को
अपने हाथोंमें थामे
अपने दिल की बात कही,
ना तुम्हारी नजरोंने
मेरी आँखोंको पढ़ने की कोशिश की...
वो
पेहले से तुमको देखने की
मेरी बैचैनी हद से बढ़ रही थी....
पर मुश्किल से मैंने
ख़ुद को सम्भाले रखा।
कुछ आधे घंटे की वह मुलाकात....
आधी सदी सी लगी!
लेकिन फिर
उठकर जाने का वक़्त आ गया।
मेरे दिल की हर धड़कन भी
मुझे भारी-भरकम लग रही थी...
पर जाते हुए
अचानक से तुमने
मेरी आँखों में आँखे डाल के देखा,
लगा, यही हो वह पेहले से तुम!
अचानक से,
पेहले ही की तरह,
तुमने गले लगा के
धीरे से, मानो दिल की गहराइयों से कहा....
"जल्द मिलते है फिर से..."
लगा, काश उस एक पल में
वक़्त थम जाएँ...
जिन्दगी बस उस एक
पल में गुज़र जाए...
- चौला दोशी