आदमी को सहज मिलता , मन में है जो ठानता
शर्त बस इतनी सी है , वह कर्म को हो मानता
त्याग , जप , तप व्यर्थ सब , यदि कर्म रत है वो नहीं
तपस्या सबसे बड़ी है , जो व्यस्त काम में हो कहीं
कर्म ही पूजा है इसको , हम सभी हैं जानते
इसे हम सब पढ़ते हैं पर , इसको हम नहीं मानते
कर्म से क्या - क्या नहीं संभव है हम हैं जानते
अकर्मण्य जो हैं धरा पर , रहते हैं भृकुटी तानते
हर सफलता का रहस्य है , सिर्फ ईमानदारी का कर्म
वह आदमी होता विजेता , समझे जो कर्म का सही मर्म
बिना काम का आदमी , एक चलती फिरती लाश है
बोझ धरती का है वह , भले चलती उसकी स्वास है
जीने का है अर्थ तब तक , यह जिंदगी भी खास है
संघर्ष ही है जिंदगी , और कर्म जीवन की स्वास है
#कर्मा