#निषेध
गूँज रहीं सागर की लहरें मन-आँगन में
उलझी हैं जब साँस साँस इस बोझिल तन में
चाहत की बगिया में नख शिख भीगे हों जब
आँसू ठहरे हुए जहाँ पर पलक पलक पर
क्षण के लिए ज़रा मुस्काना क्यों निषेध है?
पट खुलते हैं जहाँ कभी जब आहट होती
मृगतृष्णा जाने क्योंकर अहसास भिगोती
शब्द शब्द आवारा बन जब घूमा करते
और फ़लक के आँसू हृदय चूमा करते
तब पलकों पर आस सजाना क्यों निषेध है?
देकर शब्दों को गुमनामी अटके हैं हम
आँखों पर बाँधी है पट्टी भटके हैं हम
सुलग सुलग उठता है मन का कोना कोना
और तृषित मन जैसे हो बस एक खिलौना
विश्वासों के पँख लगाना क्यों निषेध है?
डॉ.प्रणव भारती