कंस संहारक रुप नारायणा,
पर ताकातहिन धुलवाएँ पैराँगना,
भीतर से जागत भाव कहूँ ना देत घाउँ,
लीला रचनाकार श्री कृष्ण धोवत हे पाऊँ,
सुदामा निर्मलकर आंसूँ बहावत याद करत कपट,
तादुर जो छुपावत खावत फिर भी स्नेह कृष्ण हे नीभावत,
तबहु सोंच श्रीकृष्ण भीतर मन संमरण सुदामा हे सुनत,
हर्षित होके द्वारिकानाथ सुदामा के सोने का महेल हे देत,
मित्र वही जो भीतरी वाणी सुणे,एसो मित्र दिप'स फ़िर ना मिलो जगत के जैसे श्रीकृष्ण सुदामा....