अंतर्मन की सैर
आइये आज कुछ नया करते है
मन के दरवाजे पर दस्तक देते है
जरा धीरे से आइयेगा मेरे ड्राइंग रूम मे
बहुत ही नाजुक से है कुछ जज़्बात
कही कुचल ना जाये पेरो से |
वो ऊपर देखिये साहेब बिखरे हुए सपनो को
समेट कर फानूस बना कर लटकाया हूँ
कुछ अधूरी ख्वाईशो से गुलदान भी तो सजाया हूँ |
सामने दीवार पर पिताजी की तस्वीर लटकी है
पर माँ मेरे साथ हमेशा रसोई मे ही रहती है |
जरा हौले से कदम रखियेगा अगले कमरे मे
मेरी बच्ची के टूटे खिलोने हर जगह रहते है |
वो अगला कमरा तो सबसे पहले बना है
जहा बचपन की बूढ़ी काकी और हामिद का
चिमटा आज भी वही पड़ा है |
अरे आप कहा रूक गए, आगे आइये स्विमिंग पूल मे आपका स्वागत है
बस पानी के खारेपन की शिकायत मत कीजियेगा जनाब
ये दिलकश जिंदगी कभी मीठे आंसू नहीं दे पायी |
अरे नही, उस सूटकेस को मत खोलियेगा सर
सैलरी स्लिप से लॉक इसमें कई हसरते कैद है
बीवी की मनाली ट्रिप और माँ का हरिद्वार का टिकट भी
अभी तक यहीं पड़ा है |
बस आगे दो ही कमरे बचे है जिसमे एक अधेरा तह खाना है
कुछ खाक हो चुके लम्हे, कुछ जल चुके सपने, कुछ निर्भीक इरादे ये सब यहाँ कैद है
इन सब को पार कर के मे हर रोज आखरी कमरे मे आता हूँ
जहाँ मेरी बच्ची की हंसी रहती है
शिरीष