¶ बहुत सी नदियों से मिलकर सांसों का सागर बनता है। वो शांत दिखता है, क्योंकि बेचैनियों का सफर करके ठहरा है।
¶ कभी कभी रात के सुबह में घुल जाने के बीच तुम्हारी हंसी खिलकर बजती है।
¶ काश, जीवन भी पल्लू में बंधा चाबियों का गुच्छा होता। तुम्हारी खिलखिलाहट की माफिक बजता जाता और जिंदगी के नए नए दरवाजे खुलते रहते।
¶ अब हमें जीवन के विष को शिकंजी मानकर बस पीते जाना है। एक दिन सब शान्त हो जाएगा, तृष्णा उदासी और जीवन, सब। तब शायद तुम भी बस मुस्कराओगी, बगैर ध्वनि के।
● बातचीत