पुरूष हवसी होने का आरोप कंधों पे उठाए हथेलियों में स्त्री के आंसू सँजोता है रात भर जगता है और अपने अस्तित्व को कुछ इस तरह से बन्धन में रखता है कि स्त्री उसके संग असहज न हो वह उंगलियों में उंगली फंसाये सड़क पे चलते हुए ध्यान रखता है कि कंधे उसके कंधे से न रगड़ जाएं
कही उसे ये न लग जाये कि मैं हवसी ही हूँ , वह प्रतीक्षा करता है उनकी सहजता की , और जानते हुए भी रह जाता है चुप , कि उसकी अभिलाषा क्या है वह रह जाना चाहता है साथ में तब तक के लिए जब तक सम्भव हो सके और ढोता रहता है सारी महत्वाकांक्षाएँ कॉफी पीने की बात हो या फ़िल्म देखने की , सूर्यास्त देखने की बात हो या सुबह सुबह पार्क में टहलने की , वक्त, जगह और सहूलियत वह चुनने देता है उन्ही को कि कहीं मैं चेप न लगने लगूं .. और फिर अरसे से पाले गए लूनी ट्यून्स दुनिया के ख्वाब पे विराम लगता है
और वह निर्णय ले लेती है एक व्यापारी की तरह , जहाँ समझ आ जाती है ज़िन्दगी की निर्दयता भी और असीमित सम्भावनाएं भी .. सबको हक है एक बेहतर ज़िन्दगी की कल्पना करना इसमे कोई गलत बात नही .. बस कुछ बेहतरी से इसे समझा पाते है कुछ समझाना ठीक भी नही समझते