एक नई परिकल्पना
यह बात उन दिनों की है जब स्वर्गीय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री पद पर थे एवं स्वर्गीय अजय नारायण मुशरान जबलपुर से लोकसभा के सांसद थे। उनके नेतृत्व में शहर से युवा कांग्रेस का एक प्रतिनिधि मंडल, राजीव जी से भेंट करने हेतु दिल्ली गया था। उनसे भेंट के दौरान राजीव जी ने अचानक ही एक प्रश्न हम लोगों के सामने रखा कि हम केंद्र से गरीबों के हितार्थ समुचित राशि प्रेषित करते है परंतु उसका अपेक्षित परिणाम नही प्राप्त हो पाता है, इसका क्या कारण है ? हमारे प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य ने उनसे निवेदन किया कि ऐसा क्यों होता है इसे मैं आपकों एक छोटे से उदाहरण के माध्यम से समझाने का प्रयास करता हूँ।
उसने एक बर्फ का टुकडा बुलवाया और राजीव जी के हाथ में देकर कहा कि इसे आप क्रमश एक दूसरे के हाथों में देने का निर्देश दे। यह सुनकर राजीव जी ने अचरज के साथ कहा कि जैसा यह कह रहे है ऐसा करिए। ऐसा कहते हुए उन्होंने अपने हाथ में रखा हुआ बर्फ का टुकडा दूसरे सदस्य के हाथों में दे दिया और उस सदस्य ने किसी दूसरे सदस्य को दे दिया। इस प्रकार क्रमश 50 सदस्यों के हाथों से गुजरने के बाद जब बर्फ का टुकडा अंतिम सदस्य के पास पहुँचा तो वह टुकडा अत्यंत छोटा हो चुका था।
राजीव जी ने जब यह देखा तो वह गंभीर होकर बोले कि मैं समझ गया कि आप क्या कहना चाहते है। जब केंद्र से धन भेजा जाता है तो वह अनेक माध्यमों से होता हुआ जनता के पास पहुँचता है और इसी कारण जितना धन भेजा जाता है तो उसका आधा भी भ्रष्टाचार के कारण जनता तक नही पहुँच पाता है ? इसके बाद राजीव जी ने कहा कि आप लोग ही इसका समाधान भी बताइये।
हमारे सदस्यों ने कहा कि कुछ ऐसा प्रबंधन किया जाए जिससे केंद्र एवं जनता के बीच के माध्यमों की संख्या सीमित हो एवं केंद्र का जनता के साथ सीधा संवाद हो सके। ऐसी प्रणाली यदि विकसित की जा सके तो भ्रष्टाचार में काफी हद कमी आ जायेगी और जनता इससे ज्यादा लाभान्वित होगी। उस समय तो यह बात सामान्य चर्चा बनकर समाप्त हो गई परंतु उस चर्चा की सार्थकता आज नजर आ रही है।