प्रकृति। poem वाह। यह सुंदरता, यह शांति, यह प्रकृति करती हमारा हाल बेहाल,
शायद इसिलिए हम (Birds) आसमान से,
धरती पर आते हैं, सालाें साल।
माैसम हाे कैसा भी,
जनवरी हाे या हाे मैई,
सदा देती हमारा साथ,
ना कुछ कहती, ना कुछ करती,
सिर्फ करती इशाराें में बात।
हरी चद्दर से अपने आप काे सँवारा है,
फूलाें का मुकुट पहनकर, अपने सिर काे सजाया है,
पेडाें से दाेसती करके, अपना जीवन सुधारा है,
सिर्फ यही नहीं, बलकी सारे जगत काे अपना दाेसत बनाया है।