बुद्धिमान और बुद्धिहीन
एक सन्त से उनके षिष्य ने पूछा- बुद्धिमान और बुद्धिहीन में क्या फर्क होता है? वे मुस्करा कर बोले- जैसा अन्तर दिन और रात में होता है वैसा ही अन्तर बुद्धिमान और बुद्धिहीन में होता है। बुद्धिमान प्रतिक्षण चिन्तन और मनन करता रहता है और उसका जीवन प्रकाशमय रहता है। उसे इस बात का ध्यान रहता है कि समय व्यतीत हो रहा है तथा वह प्रतिपल मृत्यु के निकट जा रहा है। इसीलिये वह स्वयं को सदैव सकारात्मक सृजन में संलग्न रखता है। वह जानता है कि जीवन जीवटता के साथ जीने का नाम है। इसीलिये जब तक जीवन है तब तक जितना भी निर्माण कर सको कर लो उसके बाद फिर कुछ हाथ नहीं रहेगा। वह इसी भावना से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहकर जीवन जीता है। इसके विपरीत बुद्धिहीन जीवन है सिर्फ इसलिये जीता है। उसके जीवन में चिन्तन, मनन अथवा सकारात्मक सृजन जैसी कोई बात नहीं होती है।
बुद्धिमान में बुद्धि के साथ-साथ मान भी जुड़ा है और बुद्धिमान को समाज में मान व सम्मान प्राप्त होता है। जबकि बुद्धिहीन में हीन प्रत्यय के कारण सदैव हीनता का बोध होता है और वह समाज में भी हीन दृष्टि से ही देखा जाता है।