प्रेम
***
परिकल्पना या हकीकत
******************
बात करते हैं प्रेम की
एक स्त्री और पुरुष की
क्या है प्रेम के अर्थ
नजर में स्त्री और पुरुष की
एक पुरुष का प्रेम
किसी स्त्री से प्रति
बस सिमट जाता है
देह पर चुम्बन करते ही
लेकिन इसके विपरीत
अक्सर प्रेम में स्त्रियां
करती हैं ब्रह्मांड की सैर
जैसे मचलती कोई नदी
पुरुष के ह्रदय में वास करती है
इठलाती हैं उत्तेजना भर देती है
मचलती है उसके आगोश में
बिस्तर पर बिखर जाती है।
उनके मन के भीतर छिपा
होता है कोई गहरा कुआं
जहाँ गूंजती है बस
उसकी खुद की सदाएँ
प्रेम में क्या चाहा
और क्या पाया उसने
इस अंतर से ही
बनती है लहरे
पुरुष ह्रदय में बसी नदी में
जो फिर से उसमे उत्तेजना भरती है
फिर से कामांध पुरुष का
उसे बिस्तर बना देती है
अंत में सन्तुष्ट पुरुष
लांछन लगा देता है कि
स्त्रियों ने प्रेम जताना नहीं
बस प्रेम पाना सीखा है
समझ नही पाता प्रेम को
मगर प्रेमगीत गाता है
उसका प्रेम सिमटा है
स्त्री देह के इर्दगिर्द
अपनी दैहिक भूख को
प्रेम के विशेषण से नवाजता है
स्त्री गुजार सकती है तमाम उम्र
महज प्रेम का स्पर्श पाकर
उसकी देह की लालसा किये बगैर
वासना रहित प्रेम को जीकर
इस भाव को बताइये
क्या कोई पुरुष जी पाया
क्या किसी स्त्री से प्रेम कर के
उसने जिस्म को पाना नही चाहा
जिस दिन इस प्रेम को
पुरुष जीने लग जाएंगे
नश्वर होती दुनिया मे
ब्लात्कार खत्म हो जाएंगे
एक स्त्री करेगी पूजा पुरुष की
समर्पण में सारे भाव समाहित हो जाएंगे
विनय...दिल से बस यूँ ही