एक मुसाफिर दर दर फिरता
पहुंच गया मंदिर में
एक भिकारी बैठा वहा
समेटे कुछ झोली में
देख के उसको सोच में डूबा
मुसाफिर मन ही मन में
मुफ़्त की रोटी मुफ़्त का पैसा
और दर्द नहीं हिस्से में
पीछा करते करते उसका
पहुंच गया घर उसके
देख दृष्य वो सामनेवाला
कहर उठ गया मनमें
घर में उसके छोटे बच्चे
रोटी उन्हे थमाता
मैंने खा लिया ये कहकर
पानी पि कर सोता
शिकवे सारे दूर हुए
सीखा मुसाफिर तबसे
जिंदगी है सफर सुहाना
चल के मिले है रस्ते
दुःखमें भी जो खुशिया ढुंढे
उसको मिला सदा हल
इनामदारी से यहाँ रहा जो
जीवन उसका है सरल
#सरल