सो कर तुम रोज निंद से जगते हो
लेकिन ऐक बार अपने अंतरमन को
जगा कर तो देखो, सारे दिन तुम बाहर
जग को जा़ंखते हो थोड़ा भला अपने
भीतर भी तो जांख कर तो देखो
सपने तो तुम हर रोज नये सजाते हो
लेकिन थोड़ा अपनो को प्यार करके देखो
तन को तो साफ तुम रोज करते हो लेकिन
थोड़ा मन को भी तो साफ करके तो देखो
जग को तो तुम रोज हसाते हो लेकिन कभी
अपनो को भी तो हसा कर तो तुम देखो
जग कि यात्रा तो तुम हर रोज करते हो
लेकिन अपने भीतर की यात्रा करके तो देखो
Anil Mistri
Please subscribe
YouTube channel
Bhramgyan