# अवरोध
कब तक होंगे अवरोध यहाँ
कब तक ये रिश्ते सूखेंगे ?
कब तक ढोएँगे पीड़ाएँ ?
घावों को देखें हम रिसते?
दो दिन है जीवन की बगिया ,
लगती है जैसे हों सदियाँ --
पीड़ाएँ सिर चढ़कर बोलें
मन-दवंद न जाने क्यों तोलें
अमृत-रस जाने कहाँ गया ?
भाषा का लहज़ा कहाँ गया ?
ज़ंजीरें अकड़ी बैठी हैं ,
हर मन को बाँधा जाने क्यों ?
अब रात घनी घिर आई है
अब भी घबराता है मनवा
जाने किस ओर उजाला हो
या अंधियारे ले डूबेंगे ?
डॉ . प्रणव भारती