प्रेम में कहाँ देखनी शक्ल सूरत, दो दिल मिले बस यही जरूरत।
जिस घड़ी मिले वह शुभ मुहूर्त, मन मंदिर में बस गई एक मूरत।
मन को मैंने रखा स्वच्छ निर्मल, प्रेमपुष्प खिला फैला परिमल।
समय सरिता बहने लगी कलकल, रजनी बरसाती चांदनी उज्जवल।
खुशियों में बीतने लगे एकएक पल, मन स्वप्न की दुनिया से बाहर निकल।
नफ़रत के जहाँ में कदम कदम पर छल, दर दर ठोकर खाने से तूँ बच-संभल।
मार्ग में तेरे बिछाए नहीं गये फूल, स्वार्थ के साथी है सब, तूँ गया भूल।
सुख की सेज सजाने वाले ही देगे शूल, दो पल खुशी देने वाले उम्रभर दर्द दे करेंगे वसूल।
स्नेह सुधा रस नाम पर पिलायेंगे गरल, सबको समझना नहीं है सहज सरल।
कीचड़ में सदा ही नहीं खिलते कमल, संसार प्रेम सागर नहीं, है शुष्क मृगजल।
@दीपेश कामडी 'अनीस'