बेचकर अपने सपनों को , बुने सपने तुम्हारे थे
जीत के लिए तुम्हारे हम , खुद को ही खुद से हारे थे
समय अपना लुटाया यूं , तुम्हारे वास्ते उम्रभर
शिकायत ना रहे मुझसे , रहे मुस्कान जीवन भर
रही कोशिश तमाम उम्र , पड़े न पांव में छाले
तपाया अपने को इतना , तपिश भी असर ना दाले
जरूरत साथ की है अब , ये दूरी अब अखरती है
ये सुविधा शानो शौकत की , नहीं पीड़ा को हरती है
भरा सामान सुविधा का , खुशी का पल नहीं लाता
हृदय में यदि नहीं है प्रेम , है तब कुछ भी नहीं भाता
किया नहीं त्याग का यदि मान , बढ़े हो जिसके दम पर तुम
नहीं रह पाएगा अस्तित्व , करोगे रुदन हो गुमसुम
#सामान