#ज़िंदा
मन का संवेदन हुआ क्षीण
खुद अपने लिए ही ज़िंदा है
कोई भूखा है क्या ग़म है?
हम कहाँ यहाँ शर्मिंदा हैं?
पनघट सूखे,सूखी नदियाँ
हमको तो बीत गईं सदियाँ
हम जीते-मरते रहे यहाँ
फिर लौट-लौटकर वो ही करते
अपने स्वार्थों में हैं जीते
सब कुछ पाकर भी हैं रीते?
शाश्वत सपनों की राहों में
ईर्ष्या और अहं की बाहों में
पिस पिसकर जिंदा रहते हैं
क्यों हम पीड़ाएं सहते हैं?
डॉ.प्रणव भारती