जे न मित्र दुख होई दुखारी तिन्हहि बिलोकत फातक भारी,
निज दुख गिरि सम रज करी जाना मित्रक दुख रज भेलु समाना।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहेते,जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होता,ऐसे मित्र को देखने मात्र से भी पाप लग जाता है,
असली मित्र वो होता है जो अपने पहाड़ से दुख को धुल बराबर और मित्र के धुल से दुख को सुमेरु पर्वत के समान बड़ा समझे।