# युवा
संधियाँ कर लीं न जाने इस युवा पीढ़ी ने कितनी
फिर भी तम से घिर रहे हैं ,बोलो अब कैसे सहेंगे ?
घिर गया है हृदय तम से , हुआ है जो सामना अब
और कँटीली गुफाएँ सामने हैं फाड़कर मुख
शब्द की सीमाएँ खोने जब लगें मस्तिष्क भीतर
और हलचल सी मची हो वेदना के द्वार पर जब
विगत सपनों के सहारे प्रीत कैसे कर सकोगे ?
युवा हो तो आज समझो ,जन्म की है क्या महत्ता
और कितनी जल्द ये खोता है चकमा सा दिखाकर
समझना होगा युवा कितना यहाँ पर कीमती है
देश-हित जीने की उसमें जाने कितनी लालसा है
जन्म से लेकर मरण तक झूमता है प्रेम में जो
वो सदा रहता युवा है जिसमें इतना प्रेम होता
वो कहीं खोता नहीं है ,सब मनों में बसा रहता
हम नहीं कहते, हमारा है यही इतिहास कहता -----
डॉ. प्रणव भारती