तुम जानते तो हो
मेरी हर आदत
बड़ी अच्छी तरह
फिर क्यों कहते हो
बदलने के लिये
तुम जानते हो
अकेले गिर जाऊँगी
तुम्हारा हाथ चाहिये
सँभलने के लिये
तुम चले जाओ
हमें ग़म नहीं
पर कुछ तो चाहिये
बहलने के लिये
तुम्हारा इंतज़ार ही
अब इबादत होगी
शायद आ जाओ कभी
हमसे मिलने के लिये
- अनिता पाठक