मुझे डर है
जोरों से बारिस होगी
और पहाड़ खिसक जायेंगे,
नदी की बाढ़
सब बहा ले जायेगी,
लोग अपनी ही भाषा
कुचल देंगे,
अपनी संस्कृति पर
कुल्हाड़ी चलायेंगे,
भूकम्प हिला जायेगा
हमारे देवी विश्वास,
देश का पैमाना
स्वार्थों में धँस जायेगा,
उसी डर के बीच
मैं आशावान हूँ
उसके डर से,
मौत के अनुशासन से,
शान्ति के पहरेदार से।
**महेश रौतेला