पिता
पिता संचित करते रहे
भर भर अंजुरी जल
कि बहती रहे सबकी नैया
पिता नदी थे ।
भँवर में डूबती-डगमगाती नैया को
पतवार थामकर
उबार लिया पिता ने
पिता कुशल मल्लाह थे ।
परास्त होकर
पीछे लौटने वाले रास्तों पर
पिता दीवार की तरह खड़े थे
कि आगे बढ़ना ही
एकमात्र विकल्प था
पिता हौसला थे ।
पिता ने सहेजे
कुछ तुतलाते शब्द
एक मोगरे सी हँसी
कुछ जिद
कुछ आँसू
नन्हें-नन्हें पैरों की छाप
और रच दी जीवन की सर्वश्रेष्ठ कृति "बेटी"
पिता एक अद्भुत चित्रकार थे ।
मालिनी गौतम
सभी मित्रों को पिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌺🌺🌺